अक्षरब्रह्म

                     आविष्कार अक्षरब्रह्म का   
     यह सृष्टि क्षर और अक्षर से भरी/बनी हुयी है। जहाँ सगुण का समापन होता है वहाँ से निर्गुण का आरंभ होता है। माया का अस्तित्व दूर/समाप्त होने के पश्चात केवल 'सत्य' शेष रहता है। ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ हो या फिर सहस्त्रशिर्षा......... अत्यतिष्ठत दशांगुलम्॥ हो हर कही/कोई उस 'अक्षर' की पुष्टि करते दिखायी देते है। दृश्यमान सृष्टी के साथ और उसके परे भी उस 'अक्षर' की सत्ता है।
     भाषा में शब्द के उच्चारण  पश्चात जो शेष रहता है वह 'स्वर' है। संगीत में भी स्वरोंका सा रे ग इ. नामोंसे उच्चारण करते है। 'सा' का उच्चारण होने के पश्चात 'सा' यह शब्द निकल जाता है और शेष रहता है केवल शुध्द 'नाद'। यह नाद उसी 'अक्षर' का रूप है।
        मुझे लगता है की, मनुष्य में स्थित सात्विकता यह भी उस 'अक्षर' का ही एक रूप है। मनुष्य के जन्म के बाद वह धीरे धीरे विकार से ग्रस्त होने लगता है यदि यह विकार उत्तम विचार में परिवर्तित हो जाये तो मनुष्य में स्थित उस 'अक्षर' के आविष्कार हेतु हर कोई सर्वत्र भटकता रहता है। पर उस भटकते मनुष्य को यह समझ नही आता की जब तक वह विकारोंसे घिरा हुआ है तब तक उसे दुसरोंके भीतर का वह 'अक्षर' अंश कैसे दिखायी देगा ?
          इस शरीर को देखनेवाले बहोत लोग है मुझे प्रतिक्षा है मेरे अंत:स्थित 'अक्षर' को देखनेवाले उस 'अक्षर' अंश की।

Comments

  1. छान सुंदर विचार आहेत

    ReplyDelete
  2. अप्रतिम सुरेख!

    ReplyDelete
  3. सुंदर विचार.... अप्रतिम लेखन

    ReplyDelete
  4. अविष्कार अक्षर.. . . . .. का, सूंदर, आणि अभ्यास पूर्ण विचार , प्रिती,

    ReplyDelete

Post a Comment